The year we came close
by keeping apart
The year we listened more
while wearing a mask

It started with a virus
shutting our windows and doors
Only to open others
within our very homes

The nooks and those corners
we had grown apart
Tucked away in the hiding
somewhere in our heart

The walls and the bodies
were warm all right
All we needed to see 'em
was a little bit of light

Time dropped by first
once the world had paused
Followed by laughter
also very close

Calm came next following colors and music Happiness was close by…


सब से जीत गया पर लेकिन
खुद से हार गया क्यूँ यारा
अम्मा की आँखों का तारा
आज तू बन गया क्यूँ इक और सितारा

अभी कल ही की तो बात है
जब पहली दफ़ा गूंजी थीं
तेरी किलकारियाँ
और उन छोटी सी उँगलियों ने
समेट ली थी हमारी यह दुनिया
वो चार कदम, जिन्होंने बिखेर दिए थे
ज़माने भर की ख़ुशियाँ

याद मुझे आता है स्कूल का वो पहला दिन
जब अम्मा ने सुबह सुबह बनायी थी
तेरे लिए वो पहली टिफ़िन

भीगी आँखों से, खुद से जूझते हुए तेरा हाथ पकड़ पार करायी थी ज़िंदगी की वो लकीर…


The Black, the White,
Even yellow, and brown
Were meant to be just colors
Not raise a frown

The purple, the blue,
The pink and the green,
Were all meant to be
Just part of the dream

But then I look around
Country, state or town
Where there should be a dream
There is a deafening scream

Even before I was born
I could hear it quite strong
We shall overcome
Were the words of the song

It’s meaning I couldn’t quite understand
So I waited for my dad
Whose face I had never seen
But they tell me his last words
Were, “Please, I can’t breathe..”


Bowed head, hands behind

With a bowed head
And hands behind
There’s a little prayer
On my mind

May each one of us
Around the world
Show strength, compassion
And plenty of love

While keeping the distance
Six foot afar
Let’s think of the needy
With our hearts ajar

To the brave who care
Like there’s no tomorrow
History will remember
Way past this sorrow

The times are scary
I must confess
But it is the fear
That we must suppress

The times are dark
But we will see
That our spirits will
Emerge victoriously

Until then
Let’s bow our heads
Put hands behind
And keep a little prayer on our minds


From the tribe of Corona
Came this wildly beast
Unbeknownst, unabashed to all hitherto
Rising from the East

It was no mere fling
For it took over all of the Spring
And then to West it went
Leaving half the humanity spent

Quiet were the streets
Not a single word was uttered
Who shall take it on
For every soul simply shuddered

There were no mighty swords,
No arrows, or even chords
It rode high, with the air
Until there was nothing left to bare

It came for the sick and old
Until their bodies turned to cold

It was…


Climate change (जलवायु परिवर्तन)

आज, ताकि अपना होवे कल

आज हवा है थोड़ी कड़वी
क्यूँ बदल रही ये मेरी गर्मी
पानी की इक आधी बूँद
क्यूँ माँगे मेरी आँखें मूँद मूँद

आज समंदर में उठता उफान
क्यूँ निरंतर आते ये तूफ़ान
ग़ायब होते जीव और जंतु
एक सोच आती है परंतु

ये लालची सा मन मेरा
क्यूँ गुमराह ये कर रहा
वो आवाज़ें, वो चीत्कार
क्यूँ अनसुना करें मेरे कान
सच और सही के आगे,
क्यूँ आ जाए मेरी आन

ये मौसम ले रही अंगड़ाई
अब मान भी ले मेरे भाई
कर सीने को मज़बूत
मत खड़ा रह बन के…


बॉलीवुड

रंगों के इस होड़ में
आवाज़ों के शोर में
पर्दे पर जब तुम आते हो
चकित मौन कर जाते हो
छल कपट को देकर मात
हम जीतते तुम्हारे साथ

और रंग कुछ ऐसे आए
मधुर गीत संग तुमको लाए
कथा, कहानी के कोलाहल में
प्यार सुकून सब तुम बरसाए

एक अनोखा रंग वो आया
हंसी फुहारे भर भर के लाया
काला कहें रंग है उसका
कर दे सब को हक्का बक्का
पर चल पाए ना उसका सिक्का
सामने जब आए किस्से का इक्का

पर्दे का यह चकाचौंध और अंधकार जब छटता है सपनों की इस महानगरी में सामना सच…


वो लोग और वो रिश्ते

वो बातें वो क़िस्से

क्यों लगते सब कुछ अलग अलग से

वो मामा वो मामी

वही भैया, और भाभी भी वही

झुर्रियाँ नयी पर यादें वही

क्यों लगते सभी कुछ अलग अलग से

वो गलियाँ थोड़ी जानी पहचानी सी

उन गलियों में घर, और घर के दरवाज़े भी वही

क्यों लगते सभी कुछ अलग अलग से

वो पेड़ आज भी वहीं कहीं है

वो दीवार की सिलन अभी तक मिटी नहीं है

क्यों लगते सभी कुछ अलग अलग से

वो स्वाद वही और ख़ुशबू भी वही

शोर, झलक और मिट्टी भी वही

क्यों लगते सभी कुछ अलग अलग से

फिर पार की घर की दहलीज़, और पाया की

वो कुर्सी, टेबल, और पानी का ग्लास भी वही

माँ की बातें, डाँटें, और खाने का स्वाद भी वही

ना जाने कब, शायद, मैं ही हो गया कुछ अलग अलग सा


टेबल के पीछे की उस सबसे ऊँची तख़्त से
एक पुरानी किताब आ गिरी कल मेरे सिर्हाने
धूल हटायी तो पाए पीले कुछ पन्ने
और उन पन्नों पर खींची आढ़ी तिरछी चंद लकीरें
जो याद कराएँ कई बीते अफ़साने

उन अफ़सानों में कुछ दोस्त, कई यार
आज फिर याद आ गया वो नन्हा सा प्यार

पैंट, शर्ट और वो स्वेटर थी हाफ़
लंच टाइम पर करते थे टिफ़िन को साफ़

वो हँसना हँसाना, वो लड़ना झगड़ना
बिन सोचे कर देना दूसरे को माफ़

ये सब याद कराएँ वो पीले पन्ने
और उन पन्नों पर खींची वो आढ़ी तिरछी चंद लकीरें


It was dark and cloudy with temperature close to zero degrees centigrade. The sun had not been out since the last four days and if you excluded the sporadic sunshine of last week, it would be over a month since the residents of Kunst had seen any sun. It was quite depressing to say the least.

Veronica had never felt happier, despite the weather. She had a new job, a new house and in fact, even a new boyfriend. Things were looking up for especially since she had been fired from a job six months ago.

Well, at least till…

Abhishek Bhaskar

Amateur Father, Husband and Writer

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